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GSLV MK-3 the moon mission chandrayaan-2

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GSLV MK-3 the moon mission chandrayaan-2








क्या है यह  GSLV Mk 3  और कैसे कम करता है ?
जीएसएलवी मार्क 3 से जुड़ी खास बातें...
- 640 टन का वजन, भारत का ये सबसे वजनी रॉकेट है
- नाम है जीएसएलवी मार्क 3 जो पूरी तरह भारत में बना है
- इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में 15 साल लगे. इस विशाल रॉकेट की ऊंचाई किसी 13 मंजिली इमारत के बराबर है और ये चार टन तक के उपग्रह लॉन्च कर सकता है.
- अपनी पहली उड़ान में ये रॉकेट 3136 किलोग्राम के सेटेलाइट को उसकी कक्षा में पहुंचाएगा
- इस रॉकेट में स्वदेशी तकनीक से तैयार हुआ नया क्रायोजेनिक इंजन लगा है, जिसमें लिक्विड ऑक्सीजन और हाइड्रोजन का ईंधन के तौर पर इस्तेमाल होता है.

GSLV MK-3 the moon mission chandrayaan-2



GSLV Mk 3


कैसे काम करता है जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट- GSLV Mk 3
- पहले चरण में बड़े बूस्टर जलते हैं
- उसके बाद विशाल सेंट्रल इंजन अपना काम शुरू करता है
- ये रॉकेट को और ऊंचाई तक ले जाते हैं
- उसके बाद बूस्टर अलग हो जाते हैं और हीट शील्ड भी अलग हो जाती हैं
- अपना काम करने के बाद 610 टन का मुख्य हिस्सा अलग हो जाता है
- फिर क्रायोजेनिक इंजन काम करना शुरू करता है
- फिर क्रायोजेनिक इंजन अलग होता है
- उसके बाद संचार उपग्रह अलग होकर अपनी कक्षा में पहुंचता है
- भविष्य में ये रॉकेट भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाने का काम करेगा.







21 जुलाई को भारत ने रचा गौरवशाली इतिहास-

chandrayaan-2 launch moon mission GSLV MK-3 ISRO 


chandrayaan-2 launch -चंद्रयान-2 सोमवार दोपहर 2.43 बजे श्रीहरिकोटा (आंध्रप्रदेश) के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (satish dhawan space centre in sriharikota andhra pradesh) से लॉन्च हुआ। प्रक्षेपण के 17 मिनट बाद ही यान सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा में पहुंच गया। इस मौके पर इसरो के चेयरमैन के सिवन ने कहा कि रॉकेट की गति और हालात सामान्य हैं।लॉन्च के 48 दिन बाद यान चंद्रमा की सतह पर पहुंचेगा चंद्रयान-2 चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा।चंद्रयान-2 को बनाने में 978 करोड़ की लागत लगी है। ये पूरे तरीके से स्वदेशी तकनीक से निर्मित हुआ है। कुल 3,850 किलोग्राम वजनी यह अंतरिक्ष यान ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर के साथ गया है।

GSLV MK-3 the moon mission chandrayaan-2






chandrayaan-2 launch- बना भारत का गौरव शाली इतिहास

साल 2019 -तारीख 21 जुलाई दिन sunday- जी हा दोस्तो यह वही तारीख है जिस दिन भारत ने भारत ने चंद्रमा पर अपने दूसरे महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 का देश के सबसे वजनी 43.43 मीटर लंबे जीएसएलवी-एमके3 एम1 रॉकेट की मदद से सोमवार को सफल प्रक्षेपण कर इतिहास रच दिया। 


यह देश के गौरवशाली इतिहास का सबसे खास पल बनेगा। यान की कामयाब लॉन्चिंग वैज्ञानिकों की अथक मेहनत और 130 करोड़ भारतीयों की इच्छाशक्ति के कारण हुई। यह विज्ञान के नए आयाम खोलेगा। आज हर भारतीय गर्व महसूस कर रहा होगा।















chandrayaan-2 launching मे भारत ऐसा पहला देश 
सिर्फ यही नहीं  , पूरे (world) संसार मे भारत ही पहला ऐसा देश होने जा रहा है जो  चंद्रयान-2  को दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा, आज तक ऐसा कोई देश नहीं हुआ था जिसने यान को चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर lending करवाई हो । और इसके इलवा चाँद की स्तह पर चंद्रयान-2(chandrayaan-2) की soft lending  करवा के   पूरे world के चौथे नंबर पर अपनी जगह बना लेगा ।



जी हा दोस्तो दक्षिणी ध्रुव पर काफी अंधेरा होता है। वहां सूर्य की किरणे भी नहीं पहुंच पाती है। इसलिए किसी भी देश ने आज तक वहां लैंडिंग करने की हिम्मत नहीं की।इस मिशन की सफलता के बाद भारत उन कुल 4 देशों में शामिल हो जाएगा जिन्होंने चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग की है। सॉफ्ट लैंडिंग करना इतना खतरनाक है कि अभी तक अमेरिका, रूस, चीन ही इस कारनामे को अंजाम दे पाए हैं।













जानते हैं चंद्रयान मिशन के बारे में कुछ खास बातें-
क्या है ये चंद्रयान-2(chandrayaan-2)?
चंद्रयान-2 यान भी अपने आप में बहुत खास हैं। इस यान का वजन 3800 किलो है। इसका पूरा खर्च 603 करोड़ रुपय है। चंद्रयान में 13 पेलोड हैं।इनका नाम आर्बिटर,लैंडर और रोवर रखा गया है। लैंडर का नाम इसरो के जनक डॉक्टर विक्रम ए साराभाई के नाम पर रखा गया है। जिस वक्त यह मिशन लॉन्च हुआ उस समय 250 से ज्यादा वैज्ञानिक इसरो के मिशन कंट्रोल सेंटर में मिशन पर निगरानी रख रहे थे।











क्यों चंद्रयान-2(chandrayaan-2) मिशन इसरो का सबसे मुश्किल मिशन-?
इसे इसरो का सबसे मुश्किल अभियान माना जा रहा है। सफर के आखिरी दिन जिस वक्त रोवर समेत यान का लैंडर चांद की सतह पर उतरेगा, वह वक्त भारतीय वैज्ञानिकों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं होगा। 


खुद इसरो के चेयरमैन के. सिवन ने इसे सबसे मुश्किल 15 मिनट कहा है। इस अभियान की महत्ता को इससे भी समझा जा सकता है कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी अपना एक पेलोड इसके साथ लगाया है।
















GSLV MK-3 the moon mission chandrayaan-2

कैसे भेजा जाएगा चंद्रयान-2(chandrayaan-2) को  चाँद पर ?GSLV Mk 3  
चंद्रयान-2 को बाहुबली रॉकेट से चांद पर भेजा जाएगा। इस रॉकेट का नाम GSLV Mk 3 है। इसे बाहुबली रॉकेट के नाम से जाना जाता है। ये सबसे ताकतवर रॉकेट में से एक है। इसकी लंबाई 44 मीटर है और इसका वजन 640 टन है। GSLV Mk 3 भारत का सबसे बारा रॉकेट है । 












chandrayaan-2 की पहली launching date ये थी-

चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग पहली बार अक्टूबर 2018 में टली इसरो चंद्रयान-2 को पहले अक्टूबर 2018 में लॉन्च करने वाला था। बाद में इसकी तारीख बढ़ाकर 3 जनवरी और फिर 31 जनवरी कर दी गई। बाद में अन्य कारणों से इसे 15 जुलाई तक टाल दिया गया। इस दौरान बदलावों की वजह से चंद्रयान-2 का भार भी पहले से बढ़ गया। ऐसे में जीएसएलवी मार्क-3 में भी कुछ बदलाव किए गए थे।











chandrayaan-2 launching लॉन्चिंग की तारीख एक हफ्ते आगे बढ़ी-

लॉन्चिंग की तारीख एक हफ्ते आगे बढ़ाने के बावजूद चंद्रयान-2 चांद पर तय तारीख 7 सितंबर को ही पहुंचेगा। इसे समय पर पहुंचाने का मकसद यही है कि लैंडर और रोवर तय शेड्यूल के हिसाब से काम कर सकें।




 समय बचाने के लिए चंद्रयान पृथ्वी का एक चक्कर कम लगाएगा। पहले 5 चक्कर लगाने थे, पर अब 4 चक्कर लगाएगा। इसकी लैंडिंग ऐसी जगह तय है, जहां सूरज की रोशनी ज्यादा है। रोशनी 21 सितंबर के बाद कम होनी शुरू होगी। लैंडर-रोवर को 15 दिन काम करना है, इसलिए समय पर पहुंचना जरूरी है।










रॉकेट में तकनीकी खराबी-chandrayaan-2 launch-change the launchung date-

गत 15 जुलाई को रॉकेट में तकनीकी खामी का पता चलने के बाद इसका प्रक्षेपण टाल दिया गया था। इससे पहले इसरो ने शनिवार को चंद्रयान-2 की लॉन्च रिहर्सल पूरी की थी।चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग 15 जुलाई की रात 2.51 बजे होनी थी, जो तकनीकी खराबी के कारण टाल दी गई थी। इसरो ने एक हफ्ते के अंदर सभी तकनीकी खामियों को ठीक कर लिया है।





15 जुलाई की रात मिशन की शुरुआत से करीब 56 मिनट पहले इसरो ने ट्वीट कर लॉन्चिंग आगे बढ़ाने का ऐलान किया था। इसरो के एसोसिएट डायरेक्टर (पब्लिक रिलेशन) बीआर गुरुप्रसाद ने बताया था कि लॉन्चिंग से ठीक पहले लॉन्चिंग व्हीकल सिस्टम में खराबी आ गई थी। इस कारण चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग टाल दी गई। इसके बाद शनिवार को इसरो ने ट्वीट किया कि जीएसएलवी एमके3-एम1/चंद्रयान-2 की लॉन्च रिहर्सल पूरी हो चुकी है। इसका प्रदर्शन सामान्य है।



उस दिन इसका प्रक्षेपण तड़के दो बजकर 51 मिनट पर होना था, लेकिन प्रक्षेपण से 56 मिनट 24 सेकंड पहले रॉकेट में तकनीकी खामी का पता चलने के बाद चंद्रयान-2 की उड़ान टाल दी गई थी। उस दिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द भी प्रक्षेपण स्थल पर मौजूद थे।











GSLV MK-3 the moon mission chandrayaan-2

21 जुलाई को हुई -chandrayaan-2 की सफल लौंचिंग-

कल यानी रविवार की शाम छह बजकर 43 मिनट पर प्रक्षेपण के लिए 20 घंटे की उल्टी गिनती शुरू हुई थी। इसरो का सबसे जटिल और अब तक का सबसे प्रतिष्ठित मिशन माने जाने वाले 'चंद्रयान-2 के साथ रूस, अमेरिका और चीन के बाद भारत चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश बन जाएगा। चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से की गई।



चंद्रयान-2 को 22 जुलाई को दोपहर 2.43 बजे देश के सबसे ताकतवर बाहुबली रॉकेट GSLV-MK3 से लॉन्च किया गया.





चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) प्रक्षेपण के 16 मिनट बाद प्रक्षेपण यान से अलग हो गया और पृथ्वी की पार्किंग कक्षा में प्रवेश कर गया। इसके बाद उसने सात सितंबर को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करने के लिए अपनी 30844 लाख किलोमीटर की 48 दिन तक चलने वाली यात्रा शुरू कर दी।









तीन हिस्सों में बंटा है चंद्रयान-2

चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान)
चंद्रयान-2 के तीन हिस्से हैं-ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर। अंतरिक्ष वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के सम्मान में लैंडर का नाम विक्रम रखा गया है। रोवर का नाम प्रज्ञान है, जो संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ज्ञान। चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद लैंडर-रोवर अपने ऑर्बिटर से अलग हो जाएंगे।



chandryan2


लैंडर विक्रम सात सितंबर को चांद के दक्षिणी ध्रुव के नजदीक उतरेगा। लैंडर उतरने के बाद रोवर उससे अलग होकर अन्य प्रयोगों को अंजाम देगा। लैंडर और रोवर के काम करने की कुल अवधि 14 दिन की है। चांद के हिसाब से यह एक दिन की अवधि होगी। वहीं ऑर्बिटर सालभर चांद की परिक्रमा करते हुए विभिन्न प्रयोगों को अंजाम देगा।






क्या है यह ऑर्बिटर?
वजन- 2379 किलो
मिशन की अवधि - 1 साल
आर्बिटर चंद्रमा की सतह से 100 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा में चक्कर लगाएगा। इसका काम चांद की सतह का निरीक्षण करना और खनिजों का पता लगाना है। इसके साथ 8 पेलोड भेजे जा रहे हैं, जिनके अलग-अलग काम होंगे। इसके जरिए चांद के अस्तित्व और उसके विकास का पता लगाने की कोशिश होगी। बर्फ के रूप में जमा पानी का पता लगाया जाएगा। बाहरी वातावरण को स्कैन किया जाएगा।




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क्या है यह 10- लैंडर (विक्रम)?
वजन- 1471 किलो
मिशन की अवधि - 15 दिन
इसरो का यह पहला मिशन है, जिसमें लैंडर जाएगा। लैंडर आर्बिटर (विक्रम) से अलग होकर चंद्रमा की सतह पर उतरेगा। विक्रम लैंडर चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करेगा। यह 2 मिनट प्रति सेकेंड की गति से चंद्रमा की सतह पर उतरेगा। विक्रम लैंडर के अलग हो जाने के बाद, यह एक ऐसे क्षेत्र की ओर बढ़ेगा जिसके बारे में अब तक बहुत कम खोजबीन हुई है। लैंडर चंद्रमा की झीलों को मापेगा और अन्य चीजों के अलावा लूनर क्रस्ट में खुदाई करेगा।





क्या है यह रोवर (प्रज्ञान)?
वजन- 27 किलो
मिशन की अवधि - 15 दिन (चंद्रमा का एक दिन)
प्रज्ञान नाम का रोवर लैंडर से अलग होकर 50 मीटर की दूरी तक चंद्रमा की सतह पर घूमकर तस्वीरें लेगा। चांद की मिट्टी का रासायनिक विश्लेषण करेगा। रोवर के लिए पावर की कोई दिक्कत न हो, इसके लिए इसे सोलर पावर उपकरणों से भी लैस किया गया है।










chandrayaan-2- का वज़न और लागत 

कुल 3,850 किलोग्राम वजनी यह अंतरिक्ष यान ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर के साथ गया है। पहले चंद्र मिशन की सफलता के 11 साल बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने भू-स्थैतिक प्रक्षेपण यान जीएसएलवी-मार्क ।।। के जरिए 978 करोड़ रुपये की लागत से बने 'चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण किया है। 




भारत ने चंद्रमा पर अपने दूसरे महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 का देश के सबसे वजनी 43.43 मीटर लंबे जीएसएलवी-एमके3 (GSLV MK-III) एम1 रॉकेट की मदद से सोमवार को सफल प्रक्षेपण कर इतिहास रच दिया।








कब पहुंचेगा चाँद  पर ? बाहुबली रॉकेट GSLV-MK3, chandrayaan-2, 

48 दिन में चांद पर पहुंचेगा हिंदुस्तान...
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का दूसरा मून मिशन Chandrayaan-2 सफलतापूर्वक लॉन्च हो गया है. चंद्रयान-2 को 22 जुलाई को दोपहर 2.43 बजे देश के सबसे ताकतवर बाहुबली रॉकेट GSLV-MK3 से लॉन्च किया गया. 




अब चांद के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचने के लिए चंद्रयान-2 की 48 दिन की यात्रा शुरू हो गई है. करीब 16.23 मिनट बाद चंद्रयान-2 पृथ्वी से करीब 182 किमी की ऊंचाई पर जीएसएलवी-एमके3 रॉकेट से अलग होकर पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगाना शुरू करेगा.









कब पहुंचा था चंद्रयान-1 चाँद पर - कितने दिन लगे -?
इससे 11 साल पहले इसरो ने अपने पहले सफल चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-1’ का प्रक्षेपण किया था जिसने चंद्रमा के 3,400 से अधिक चक्कर लगाए और यह 29 अगस्त, 2009 तक 312 दिन तक काम करता रहा। 









क्या है chandrayaan-2 का mission लक्ष्य ?

इसका मुख्य उद्देश्य चांद पर पानी की मात्रा का अध्ययन करना, चांद पर मौजूद खनिजों, रयासनों के बारे में पता करना, चांद के वातावरण का अध्ययन करना शामिल है। चंद्रयान-2 में कई प्रकार के कैमरे, रडार लगे हैं जिससे चांद के बारे में गहराई से अध्ययन हो सकेंगा।





इसरो ने चंद्रयान-2 पर कहा है, ''हम वहां की चट्टानों को देख कर उनमें मैग्नीशियम, कैल्शियम और लोहे जैसे खनिज तत्वों को खोजने का प्रयास करेगें. इसके साथ ही वहां पानी होने के संकेतो की भी तलाश करेगें और चांद की बाहरी परत की भी जांच करेंगे। चाँद को लेकर दुनिया भर में खोज जारी है. चंद्रयान-1 जब 2008 में लॉन्च किया गया था तो उसने इस बात की पुष्टि की थी कि चाँद पर पानी है लेकिन चाँद की सतह पर नहीं उतर पाया था.










ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर क्या काम करेंगे?

चंद्रयान-2 भारत की चाँद की सतह पर उतरने की पहली कोशिश है. इससे पहले यह काम रूस, अमरीका और चीन कर चुका है. चार टन के इस अंतरिक्षयान में एक लूनर ऑर्बिटर है. इसके साथ ही एक लैंडर और एक रोवर है।




इस मिशन में लैंडर का नाम विक्रम दिया गया है और रोवर का नाम प्रज्ञान है. "विक्रम" भारत के अंतरिक्ष प्रोग्राम के पहले प्रमुख के नाम पर रखा गया है. डॉ.साराभाई भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक के रूप में जाने जाते थे; वे एक महान संस्था बिल्डर थे और विविध क्षेत्रों में बड़ी संख्या में संस्थानों को स्थापित या स्थापित करने के लिए मदद की।



GSLV MK-3 the moon mission chandrayaan-2
क्या होता है लैंडर और रोवर ?
लैंडर वो है जिसके ज़रिए चंद्रयान पहुंचेगा और और रोवर का मतलब उस वाहन से है जो चाँद पर पहुंचने के बाद वहां की चीज़ों को समझेगा. मतलब लैंडर रोवर को लेकर पहुंचेगा.



चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद ऑर्बिटर एक साल तक काम करेगा। इसका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी और लैंडर के बीच कम्युनिकेशन करना है। ऑर्बिटर चांद की सतह का नक्शा तैयार करेगा, ताकि चांद के अस्तित्व और विकास का पता लगाया जा सके।




वहीं, लैंडर और रोवर चांद पर एक दिन (पृथ्वी के 14 दिन के बराबर) काम करेंगे। लैंडर यह जांचेगा कि चांद पर भूकंप आते हैं या नहीं। जबकि, रोवर चांद की सतह पर खनिज तत्वों की मौजूदगी का पता लगाएगा। चंद्रयान-2 के हिस्से ऑर्बिटर और लैंडर पृथ्वी से सीधे संपर्क करेंगे लेकिन रोवर सीधे संवाद नहीं कर पाएगा. ये 10 साल में चांद पर जाने वाला भारत का दूसरा मिशन है.









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chandrayaan-2 lending के लिए दक्षिणी धुव्र क्यों चुना ?

भारत का चंद्रयान-2 चाँद के अपरिचित दक्षिणी ध्रुव पर सितंबर के पहले हफ़्ते में लैंड करेगा. वैज्ञानिकों का कहना है कि चाँद का यह इलाक़ा काफ़ी जटिल है. वैज्ञानिकों के अनुसार यहां पानी और जीवाश्म मिल सकते हैं.



मुंबई स्थित थिंक टैंक गेटवे हाउस में 'स्पेस एंड ओशन स्टडीज' प्रोग्राम के एक रिसर्चर चैतन्य गिरी ने वॉशिगंटन पोस्ट से कहा है, ''चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर कोई अंतरिक्षयान पहली बार उतरेगा.


कोई यह पूछ सकता है कि जोखिम होने पर भी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास ही चंद्रयान क्यों उतरा जा रहा है और चांद में खोज के लिए जाने वाले मिशन के लिए ये ध्रुव महत्वपूर्ण क्यों बन गए हैं.




दरअसल, चंद्रमा का दक्षिणी धुव्र एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी अभी तक जांच नहीं की गई. यहां कुछ नया मिलने की संभावना हैं. इस इलाके का अधिकतर हिस्सा छाया में रहता है और सूरज की किरणें न पड़ने से यहां बहुत ज़्यादा ठंड रहती है.
वैज्ञानिकों का अंदाज़ा है कि हमेशा छाया में रहने वाले इन क्षेत्रों में पानी और खनिज होने की संभावना हो सकती है. हाल में किए गए कुछ ऑर्बिट मिशन में भी इसकी पुष्टि हुई है.




पानी की मौजूदगी चांद के दक्षिणी धुव्र पर भविष्य में इंसान की उपस्थिति के लिए फायदेमंद हो सकती है. यहां की सतह की जांच ग्रह के निर्माण को और गहराई से समझने में भी मदद कर सकती है. साथ ही भविष्य के मिशनों के लिए संसाधन के रूप में इसके इस्तेमाल की क्षमता का पता चल सकता है।






chandrayaan-2 दुनियाभर की टिकी है निगाह 

इस मिशन पर

चंद्रयान-2 की सफलता पर भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। चंद्रयान-1 ने दुनिया को बताया था कि चांद पर पानी है। अब उसी सफलता को आगे बढ़ाते हुए चंद्रयान-2 चांद पर पानी की मौजूदगी से जुड़े कई ठोस नतीजे देगा। अभियान से चांद की सतह का नक्शा तैयार करने में भी मदद मिलेगी, जो भविष्य में अन्य अभियानों के लिए सहायक होगा।



चांद की मिट्टी में कौन-कौन से खनिज हैं और कितनी मात्रा में हैं, चंद्रयान-2 इससे जुड़े कई राज खोलेगा। उम्मीद यह भी है कि चांद के जिस हिस्से की पड़ताल का जिम्मा चंद्रयान-2 को मिला है, वह हमारी सौर व्यवस्था को समझने और पृथ्वी के विकासक्रम को जानने में भी मददगार हो सकता है।













चंद्रयान-2 -Chandrayaan-2 the moon mission

अर्थ से मून आर्बिट तक पहुंचने तक तीन देशों के

खगोलशास्त्री रखेंगे नजर-

अमेरिका, रूस और चीन के बाद अंतरिक्ष में चौथी महाशक्ति के रूप में विकसित हुए भारत के चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट पर देश-दुनिया की निगाह है। चंद्रमा की आर्बिट में पहुंचने तक यह बेहद संवेदनशील प्रक्रिया के अंतर्गत निगहबानी में रहेगा।



 तीन देशों में भारत के बनाए गए खास सिस्टम इस पर नजर रखेंगे। इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक और चंद्रयान-2 प्रक्षेपण टीम का हिस्सा रहे बदायूं, उप्र निवासी सतपाल अरोरा से इस बारे में फोन पर बात हुई।

chandrayaan-2

उन्होंने बताया कि छह और सात सितंबर को चंद्रमा की आर्बिट में पहुंचने की प्रक्रिया के अंतर्गत चंद्रयान-2 की हर गतिविधि पर निगाह रखने की जिम्मेदारी वैसे तो इसरो पर ही है लेकिन इसरो की देखरेख में अमेरिका, रूस और चीन में बने भारतीय स्पेस सेंटर भी इस पर नजर रखेंगे।




अर्थ आर्बिट यानि पृथ्वी की कक्षा से मून की आर्बिट अर्थात चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने पर चंद्रयान-2 की गति में परिवर्तन होंगे। इसको लेकर पूरी दुनिया के खगोल शास्त्रियों में काफी उत्साह है। वे चंद्रयान-2 की प्रत्येक गतिविधि को देखने के लिए अपने-अपने तरह से जुटे हुए हैं। चंद्रमा पर लैंडिंग करने के बाद चंद्रयान-2 का सक्रिय काल एक साल तय है। हालांकि यह अपनी मियाद से भी अधिक काम कर सकता है।




वन टीम वन ड्रीम : सतपाल
इसरो में सीनियर साइंटिस्ट सतपाल अरोरा उर्फ मिक्कू ने कहा कि चंद्रयान-2 के प्रक्षेपण की पूरी प्रक्रिया पर इसरो में काफी उत्साह है। यह वन टीम वन ड्रीम है। यह अपने लक्ष्यों को पूरा करेगा और हमें भरोसा है कि दुनिया के सामने भारत नया कीर्तिमान स्थापित करेगा।







GSLV MK-3 the moon mission chandrayaan-2
chandrayaan-2 कितना अलग है 

chandrayaan-1 से ?

चंद्रयान-2 वास्तव में चंद्रयान-1 मिशन का ही नया संस्करण है। इसमें ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) शामिल हैं। चंद्रयान-1 में सिर्फ ऑर्बिटर था, जो चंद्रमा की कक्षा में घूमता था। चंद्रयान-2 के जरिए भारत पहली बार चांद की सतह पर लैंडर उतारेगा। यह लैंडिंग चांद के दक्षिणी ध्रुव पर होगी। इसके साथ ही भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर यान उतारने वाला पहला देश बन जाएगा




इस बार चंद्रयान-2 का वजन 3,877 किलो है। यह चंद्रयान-1 मिशन (1380 किलो) से करीब तीन गुना ज्यादा है। लैंडर के अंदर मौजूद रोवर की रफ्तार 1 सेमी प्रति सेकंड है।चाँद को लेकर दुनिया भर में खोज जारी है. चंद्रयान-1 जब 2008 में लॉन्च किया गया था तो उसने इस बात की पुष्टि की थी कि चाँद पर पानी है लेकिन चाँद की सतह पर नहीं उतर पाया था. 







GSLV MK-3 the moon mission chandrayaan-2
क्या था चंद्रयान-1और उसका मिशन-

जानिए chandrayaan-1 के बारे मे  जरूरी बाते 

क्या था chandrayaan-1 और उसका मिशन

चंद्रयान-1 चंद्रमा पर जाने वाला भारत का पहला मिशन था. ये मिशन लगभग एक साल (अक्टूबर 2008 से सितंबर 2009 तक) था. चंद्रयान-1 को 22 अक्टूबर 2008 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अंतरिक्ष में भेजा गया था.



ये आठ नवंबर 2008 को चंद्रमा पर पहुंच गया था. इस चंद्रयान ने चंद्रमा की कक्षा में 312 दिन बिताए थे. तत्कालीन इसरो के चेयरमैन जी माधवन नायर ने चंद्रयान मिशन पर संतोष जताया था. चाँद को लेकर दुनिया भर में खोज जारी है. चंद्रयान-1 जब 2008 में लॉन्च किया गया था तो उसने इस बात की पुष्टि की थी कि चाँद पर पानी है लेकिन चाँद की सतह पर नहीं उतर पाया था. 




उन्होंने बताया था कि चंद्रयान को चंद्रमा के कक्ष में जाना था, कुछ मशीनरी स्थापित करनी थी. भारत का झंडा लगाना था और आंकड़े भेजने थे और चंद्रयान ने इसमें से सारे काम लगभग पूरे कर लिए हैं.




चंद्रयान 1 की खोजों को आगे बढ़ाने के लिए चंद्रयान-2 को भेजा जा रहा है. चंद्रयान-1 के खोजे गए पानी के अणुओं के साक्ष्यों के बाद आगे चांद की सतह पर, सतह के नीचे और बाहरी वातावरण में पानी के अणुओं के वितरण की सीमा का अध्ययन करने की ज़रूरत है.
भारत ने इससे पहले चंद्रयान-1 2008 में लॉन्च किया था. यह भी चाँद पर पानी की खोज में निकला था. भारत ने 1960 के दशक में अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू किया था और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे में यह काफ़ी ऊपर है।



डॉ.विक्रम साराभाई- vikram sarabhai
dr vikram sarabhai


डॉ.साराभाई  (vikram sarabhai)भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक के रूप में जाने जाते थे; वे एक महान संस्था बिल्डर थे और विविध क्षेत्रों में बड़ी संख्या में संस्थानों को स्थापित या स्थापित करने के लिए मदद की। उन्होंने अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीः





1947 में कैम्ब्रिज से स्वतंत्र भारत में लौटने के बाद, (vikram sarabhai) अहमदाबाद में अपने घर के पास परिवार और दोस्तों के द्वारा नियंत्रित चैरिटेबल ट्रस्ट को एक शोध संस्था को दान करने के लिए राजी किया ।




 इस प्रकार, विक्रम साराभाई ने,(vikram sarabhai) 11 नवंबर, 1947 को अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) की स्थापना की । उस समय वे केवल 28 वर्ष के थे। साराभाई (vikram sarabhai) निर्माता और संस्थाओं के जनक थे और पीआरएल इस दिशा में पहला कदम था। विक्रम साराभाई (vikram sarabhai) ने 1966-1971 तक पीआरएल में कार्य किया।




भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। (vikram sarabhai)भारत जैसे विकासशील देश के लिए रूस स्पुतनिक के सफलतापूर्वक प्रक्षेपण के बाद अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व पर सरकार को राजी कर लिया। डॉ साराभाई (vikram sarabhai) अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व पर यह वक्तव्य बल प्रदान करता है।




वे परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष भी थे। अन्य अहमदाबाद के उद्योगपतियों के साथ मिलकर उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाई।




डॉ. साराभाई (vikram sarabhai) द्वारा स्थापित जाने माने कुछ संस्थान हैं:

भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद

भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), अहमदाबाद

कम्यूनिटी साइंस सेंटर, अहमदाबाद

कला प्रदर्शन के लिए दर्पण अकादमी, अहमदाबाद (अपनी पत्नी के साथ)

विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम

अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, अहमदाबाद (साराभाई द्वारा स्थापित छह संस्थानों/ केन्द्रों के 
विलय के बाद यह संस्था अस्तित्व में आई)

फास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर), कलपक्कम

परिवर्ती ऊर्जा साइक्लोट्रॉन परियोजना, कलकत्ता

भारतीय इलेक्ट्रॉनकी निगम लिमिटेड (ईसीआईएल), हैदराबाद

भारतीय यूरेनियम निगम लिमिटेड (यूसीआईएल), जादुगुडा, बिहार





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